The Forest Rights Act

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“Joint Coordination” By Tribal and Environment Ministries – Undermining Forest Rights Through the Back Door?

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On July 6th, the Ministry of Environment and Forests and the Ministry of Tribal Affairs issued a “joint communication” to all State governments on the implementation of the Forest Rights Act. This “joint communication” conceals more than it reveals and we fear it may actually undermine this vital law even further. As a national platform of tribal and forest dwellers’ organisations, we do not agree with the organisations that have welcomed this communication and instead call upon the government to immediately ensure that all policies respect the rights of forest dwellers and to take action against officials who violate them.

First, some background. The Forest Rights Act has been the subject of an unrelenting attack by forest officials since it was passed in 2006. This attack has become far more intense under the NDA government, culminating in the government’s failure to defend the law in the Supreme Court that led to an order in February 2019 that would have resulted in the eviction of millions of families. After nationwide protests by forest dwellers the government succeeded in getting the Court to put its order on hold, but since then it has done nothing either in that case or otherwise to ensure implementation of the law and recognition of rights. Instead, in most major states, implementation of this law has slowed to almost nil – but the Central Ministry of Tribal Affairs only focused on reviewing rejected claims. Meanwhile, the Environment Ministry has been pushing and implementing policies that either ignore or directly violate the Forest Rights Act, including passing the Compensatory Afforestation Fund Act without a word about forest rights in 2016, proposing a draconian Indian Forest Act in 2019, repeatedly proposing handing over forests to private companies for afforestation (see here for instance), planting trees on lands used and cultivated by forest dwellers in the name of afforestation, and so on. Repeatedly, despite the law’s clear requirement that the consent of communities is required before forests can be destroyed for ‘development projects’ and private companies, the Environment Ministry has simply broken the law and handed over tens of thousands of hectares of land. Most recently, over a hundred projects were recommended for forest diversion during the national lockdown – at a time when there was no way the forest authorities could have taken the consent of forest dwellers’ gram sabhas (village assemblies), as required by law.

Against this combination of apathy and illegality comes the new ‘joint communication.’ At first glance this seems like a welcome change from years of silence. But it very quickly descends into an eyewash, declaring that there has “been no conflict insofar as the legal framework of the law is concerned” (para 3) – a statement that flies in the face of facts.

The communication may in fact dilute forest rights in three crucial ways:

  • Community forest management: The Forest Rights Act provides – for the first time in over a century – that forest dwellers have a legal right to protect and manage forests. This right is a legal right that supersedes any Forest Department controlled arrangement. But this has barely been implemented, and the new communication now says that forest officials should “assist” gram sabhas in preparing plans and that the “benefits” from Joint Forest Management – an entirely Forest Department controlled scheme – should be “harnessed” for this (paragraph 6). Even more critical is what the communication does not say, which is that, as per the Act, Rules and even Tribal Ministry guidelines, decisions and plans made by the gram sabha for forest protection supersede Joint Forest Management and will be binding on forest officials and other actors a well. These paragraphs will just become a license for forest officials to again attempt to impose their diktats, if they make any difference at all.
  • Non-timber forest produce: One of the central sources of income for tribals and forest dwellers, NTFP is, as per the Act, the property of forest dwellers. Most major states have ignored this provision and continued to allow the forest authorities to have a monopoly over NTFP. This communication indirectly strengthens this practice by directing State Forest Departments to undertake projects for value chain addition on NTFPs (para 8(i)) without saying a word about respecting ownership rights.
  • Bringing the forest bureaucracy back into policymaking: The Act says that the Ministry of Tribal Affairs will be the nodal agency for issuing directions on forest rights, and indeed at the time of the Act’s passage the government’s Business Rules were amended to place the rights of forest dwellers in the Tribal Ministry’s domain. This was deliberately done to ensure that forest officials do not attempt to hijack the law. But the new communication says that State governments should approach the Central government for clarifications, and “both Ministries may take a collective view” on issues that arise from the law. This is essentially a back door for forest officials to control implementation of the law, when the law itself specifically denies them that role.

All in all this new joint communication, rather than a step forward for forest rights, appears to be one more in a long sequence of efforts to undermine the law while rhetorically paying lip service to its provisions. We call upon the NDA government to actually ensure respect for forest rights, rather than engaging in cynical eyewash exercises like this new communication.

Campaign for Survival and Dignity

आदिवासी मंत्रालय और पर्यावरण व वन मंत्रालय का “संयुक्त वक्तव्य”: वन अधिकार (मान्यता) कानून को कमज़ोर करने की प्रयास ही है

6 जुलाई को, पर्यावरण व वन मंत्रालय और जनजातीय कार्य मंत्रालय ने वन अधिकार अधिनियम के कार्यान्वयन पर सभी राज्य सरकारों को “संयुक्त वक्तव्य” जारी किया। यह “संयुक्त वक्तव्य” जितनी बातें प्रकट करता है उससे कहीं अधिक छुपाता है और हमें चिंता है कि यह वास्तव में इस महत्वपूर्ण कानून को और भी कमजोर कर सकता है। आदिवासी और जंगलवासी संगठनों के राष्ट्रीय मंच के रूप में, हम उन संगठनों से सहमत नहीं हैं जिन्होंने इस वक्तव्य का स्वागत किया है और हम सरकार से यह मांग करते है कि वह सुनिश्चित करे कि सभी नीतियां जंगल में रहने वाले समुदायों के अधिकारों का सम्मान करें और उल्लंघन करने वाले अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई करें।

 पृष्ठ्भूमि:   जबसे वन अधिकार अधिनियम 2006 पारित हुआ , उस समय से वन विभाग के अधिकारियों उसको कमज़ोर करने की प्रयास में रहे हैं। जबसे NDA सरकार आयी है तबसे  यह हमला कहीं अधिक तीव्र हो गया है।  सरकार सुप्रीम कोर्ट में इस कानून की वचाव गंभीर रूप से नहीं की जिसकी वजह से फरवरी 2019 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा  एक आदेश जारी हुआ जिसके परिणामस्वरूप लाखों परिवारों को बेदखल कर दिया गया होता। आदिवासियों और अन्य जंगलवासियो के राष्ट्रव्यापी विरोध के बाद सरकार ने न्यायालय को अपने आदेश पर रोक लगाने में सफलता हासिल की, लेकिन तबसे सरकार ने उस मामले में या  कानून के कार्यान्वयन और अधिकारों की मान्यता सुनिश्चित करने के लिए कुछ भी नहीं किया है। इसके बजाय, अधिकांश प्रमुख राज्यों में, इस कानून का कार्यान्वयन लगभग शून्य हो गया है – लेकिन केंद्रीय जनजातीय कार्य मंत्रालय ने केवल अस्वीकृत दावों की समीक्षा पर ध्यान केंद्रित किया है। इस बीच, पर्यावरण मंत्रालय उन नीतियों को आगे बढ़ा रहा है और लागू कर रहा है जो वन अधिकार अधिनियम की अनदेखा करते हैं या सीधे उल्लंघन करते हैं, जिसमें क्षतिपूर्ति वनीकरण निधि अधिनियम (2016) पारित करना शामिल है जो वन अधिकारों को ले कर एक शब्द भी नही कहता ।

 2019 में   भारतीय वन कानून,2007 को और  जनविरोधी-दमनकारी बनाने की मनसा  से संशोधन हेतु प्रस्ताव करना, बार-बार वनों को वनीकरण के लिए निजी कंपनियों को सौंपना , वनीकरण के नाम पर आदिवासियों और अन्य जंगलवासियों द्वारा उपयोग की जाने वाली ज़मीन तथा खेती की जानेवाली ज़मीन पर  ज़बरन पेड़ लगाना, इत्यादि। बार-बार, कानून की स्पष्ट अंदेशा के बावजूद , ‘विकास परियोजनाओं’ और निजी कंपनियों के लिए जंगलों को डाइवर्ट करने से पहले वन समुदायों की सहमति का अनिवार्यता को पर्यावरण मंत्रालय ने उलंघन किया है और हजारों हेक्टेयर भूमि को परियोजनाओं के लिए सौंप दिया है। हाल ही में, राष्ट्रीय लॉकडौन  के दौरान वन डायवर्जन के लिए सौ से अधिक परियोजनाओं को स्वीकृति दी गयी थी  – ऐसे समय में जब वन अधिकारियों के पास आदिवासियों और जंगलवासियों के ग्राम सभाओं की सहमति लेने का कोई तरीका नहीं था, जैसा कि कानून द्वारा आवश्यक था।

उदासीनता और अवैधता के इस घृणित गठजोड़  के बीच नया ‘संयुक्त वक्तव्य ‘ आया है। पहली नज़र में यह सालों की खामोशी के बाद एक योग्य बदलाव जैसा लगता है।  लेकिन यह शुरुवात में ही घोषणा करता है कि “वन अधिकार कानून के कानूनी ढांचे के संबंध में कोई टकराव नहीं रही है” (पैरा 3) – एक बयान जो तथ्यो से बिलकुल परे है।

संयुक्त वक्तव्य वास्तव में तीन महत्वपूर्ण तरीकों से वन अधिकारों को कमजोर कर सकता है:

– सामुदायिक वन प्रबंधन: – सदियों से वन -अतिक्रमणकारी मानेजानेवाले आदिवासी और जंगलवासियों को  पहली बार वन अधिकार अधिनियम वनों की रक्षा और प्रबंधन का कानूनी अधिकार से सशक्त करता है । यह अधिकार एक कानूनी अधिकार है जो किसी वन विभाग द्वारा नियंत्रित व्यवस्था का स्थान लेता है। लेकिन इसकी अमल बहुत कम क्षेत्रों में हुई है, और अब नया संयुक्त वक्तव्य कहता है कि वन अधिकारियों को योजना तैयार करने में ग्राम सभाओं की “सहायता” करनी चाहिए और संयुक्त वन प्रबंधन – जो पूरी तरह से वन विभाग का नियंत्रित योजना है, उससे हुई “लाभों का उपयोग” किया जाना चाहिए। (पैराग्राफ 6)। इससे भी अधिक चिंताजनक बात है  जिन बातों को संयुक्त वक्तव्य छिपा देता है:   अधिनियम, नियमों और यहां तक कि जनजातीय कार्य मंत्रालय के दिशानिर्देशों के अनुसार, वन संरक्षण के लिए ग्राम सभा द्वारा किए गए निर्णय और योजनाएं वन विभाग द्वारा नियंत्रित संयुक्त वन प्रबंधन कार्यक्रम  का स्थान लेगी जो वन अधिकारियों पर तथा अन्य संस्थानों पर बाध्यकारी होंगी ।  इसलिए ये पैराग्राफ वन अधिकारियों के लिए एक बार फिर से अपने फरमानों को लागू करने का प्रयास करने का लाइसेंस बन सकता है ।

– लघु वनोपज : आदिवासियों और जंगलवासियों  के लिए आय के केंद्रीय स्रोतों में से एक, लघु वनोपज, अधिनियम के अनुसार, स्थानीय समुदायों की संपत्ति है। अधिकांश प्रमुख राज्यों ने इस प्रावधान को नजरअंदाज किया है और वन विभाग के अधिकारियों को लघु वनोपज पर एकाधिकार की अनुमति देना जारी रखा है। यह संयुक्त वक्तव्य परोक्ष रूप से राज्य वन विभागों का निरंकुश  अधिकार को और संवृद्ध करते हुए (पैरा 8 (i)) वनोपज मूल्य -श्रृंखला वृद्धि के लिए परियोजनाओं को शुरू करने का निर्देश देकर इस प्रथा को मजबूत करता है।

– वन विभाग को नीति निर्धारण में वापस लाना: अधिनियम कहता है कि जनजातीय कार्य मंत्रालय वन अधिकारों पर दिशा-निर्देश जारी करने के लिए नोडल एजेंसी होगी, और वास्तव में अधिनियम के पारित होने के समय केंद्र सरकार अपनी बिज़नेस-रूल्स  (विभागों की ज़िम्मेदारी )को संशोधित किया था ।वन अधिकारों संवंधित कार्य को जनजातीय कार्य मंत्रालय का अधिकार क्षेत्र में लाया था। यह जानबूझकर किया गया था ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि वन अधिकारी कानून को हाईजैक करने का प्रयास न करें। लेकिन नया संयुक्त वक्तव्य कहता है कि राज्य सरकारों को  केंद्र सरकार से वन-अधिकार संवंधित कोई स्पष्टीकरण  मांगे जाएंगे तब  पर्यावरण व वन मंत्रालय और जनजाति मंत्रालय दोनों मिलकर  निर्देशित करेंगे। इस तरह  केंद्र सरकार के तरफ से वन विभाग के लिए कानून का कार्यान्वयन को नियंत्रित करने के लिए एक चोर  दरवाजा खुल गया, जब की कानून स्वयं विशेष रूप से उन्हें उस भूमिका से इनकार करता है।

इस नए संयुक्त वक्तव्य में, वन अधिकारों के लिए एक कदम आगे बढ़ने के बजाय, कानून को कमजोर करने के प्रयासों की  लम्बी कड़ी में एक और  पड़ाव के रूप में प्रतीत होता है ।
हम केंद्र सरकार से मांग करते हैं कि वह वास्तव में वन अधिकारों के लिए निष्ठा के साथ कार्यान्वयन करें ,न कि इस नए वक्तव्य जैसे झूठा प्रयास करें।

इज्जत से जीने का अधिकार अभियान